Monday, September 12, 2011



करता हुँ मैं हज़ारों गलतियाँ
क्योकि नादान हुँ मैं
डरता हुँ तुझको मँजिल बनाने से
क्योंकि खुद से अँजान हुँ मैं
हाँ छुपाया है तुझे दुनियाँ कि नज़रों से
क्योकि थोड़ा बेईमान हुँ मैं
युँ तुझको कुछ बोलना अच्छा नहीं लगता
पर खुद से ही परेशान हुँ मैं
उस हुस्न कि कीमत कोई कैसे लगाये
जिस हुस्न का कदरदान हुँ मैं
उस ज़िन्दगी पर क्या भरोसा करें
जिसका खुद मेहमान हुँ मैं
पसंद आये तोह स्वीकार लेना, नहीं तो
गलतीयों का पुतला ईन्सान हुँ मैं.

Sunday, December 19, 2010

मस्ताना बचपन

काश मिल जाये वो दोस्त पुराने
लौट आये वोह बचपन प्यारा
स्कुल जाते दो किलो बस्ते क साथ
एक हाथ में टिफ़िन दुसरे में बोटल

ना जाने कब आ गयी ये जवानी
छिन्न गयी हमसे ख्वाहिशें पुरानी
आ गये कॉलज कि गलीयों में
मिला जहाँ अँधेरे में जगमगाता हॉस्टल